Saturday, 6 August 2011

दिल तोड़कर


दिल तोड़कर वो बड़ गए, यूँ मुस्कुराकर प्यार से,
जैसे ना था कोई वास्ता, उनका हमारी आह से |

कुछ पल लगे हमको हमारी,
दिल की चाबी खोलने में,
एक पल लगा उनको हमारे, दिल का सांचा तोड़ने में |

वो चल दिए एक शान से,
इस ज़िन्दगी से दूर जब,
हमने भी कुछ पल के लिए, थामा था ग़म का हाथ तब |

बीते जो लम्हे साथ थे,
चुभने लगे थे आँखों में,
कुछ आरज़ू कुछ ख्वाहिशें, अब कम थी अपनी सांसों में |

हमने तो उनको सब दुखों  से,
दूर रखना चाहा था,
वो दे चले हमको थमाकर, गम का सागर हाथ में |

जब प्यार हमसे था उन्हें,
तब आँखों में बस वो ही वो थे,
अब आंशुओं का वेग, दे जाता हमें कुछ और है |

तब मन में चाहत ये बची थी,
धरती अम्बर एक कब हों,
उनकी तड़पती इन लबों पर, आह कब तक और है |

जीवन लगा था बन गया,
एक रेत का मंज़र घना,
प्यासे पथिक की राह की, हर आह से जैसे सना |


कहती थी हर पग की कशिश,
तू पास आता क्यों नहीं,
बोली थी सांसों की खनक, खुद में समाता क्यों नहीं !

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