दिल तोड़कर वो बड़ गए, यूँ मुस्कुराकर प्यार से,
जैसे ना था कोई वास्ता, उनका हमारी आह से |
कुछ पल लगे हमको हमारी, दिल की चाबी खोलने में,
एक पल लगा उनको हमारे, दिल का सांचा तोड़ने में |
वो चल दिए एक शान से, इस ज़िन्दगी से दूर जब,
हमने भी कुछ पल के लिए, थामा था ग़म का हाथ तब |
बीते जो लम्हे साथ थे, चुभने लगे थे आँखों में,
कुछ आरज़ू कुछ ख्वाहिशें, अब कम थी अपनी सांसों में |
हमने तो उनको सब दुखों से, दूर रखना चाहा था,
वो दे चले हमको थमाकर, गम का सागर हाथ में |
जब प्यार हमसे था उन्हें, तब आँखों में बस वो ही वो थे,
अब आंशुओं का वेग, दे जाता हमें कुछ और है |
तब मन में चाहत ये बची थी, धरती अम्बर एक कब हों,
उनकी तड़पती इन लबों पर, आह कब तक और है |
जीवन लगा था बन गया, एक रेत का मंज़र घना,
प्यासे पथिक की राह की, हर आह से जैसे सना |
कहती थी हर पग की कशिश, तू पास आता क्यों नहीं,
बोली थी सांसों की खनक, खुद में समाता क्यों नहीं !