प्रेमिका बाहें हैं मेरी, प्रेमिका मेरे नयन,
प्रेमिका
साँसें हैं मेरी, प्रेमिका मेरे कथन !
वक़्त के
संग है बदलता, प्रेमिका का अर्थ भी ,
समय
बदला, काल बदला, प्रेम का भावार्थ भी !
बालपन
में मैं था प्रेमी, माँ की प्यारी गोद का,
उसके
मुँह से बहने वाली मीठी पावन लोरी का !
बहन की
मुस्कान में भी प्रेम ही मुझको दिखा,
अनुज की
अठखेलियों ने प्रेम का अक्षर लिखा !
युवावस्था
में पिताजी ने सिखाया जो मुझे,
प्रेम
आया उनकी सारी ज्ञानवर्धक बातों में !
साथियों
संग प्रेम से आया मज़ा हर खेल में,
छोटे
बड़े , अच्छे बुरे सब उन पलों के मेल में !
फिर मिला
कोई वो जो सबसे अलग हमको लगा,
प्रेम
जिसकी सांस से , प्रेम धड़कन से जगा !
अतः जग
में प्रेम का कोई एक मानक है नहीं,
जिस जगह
से स्नेह मिलता, प्रेम बस्ता है वहीँ !
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