Friday, 1 March 2013

प्रेमिका ...



प्रेमिका बाहें हैं मेरी, प्रेमिका मेरे नयन,
प्रेमिका साँसें हैं मेरी, प्रेमिका मेरे कथन !

वक़्त के संग है बदलता, प्रेमिका का अर्थ भी ,
समय बदला, काल बदला, प्रेम का भावार्थ भी !

बालपन में मैं था प्रेमी, माँ की प्यारी गोद का,
उसके मुँह से बहने वाली मीठी पावन लोरी का !

बहन की मुस्कान में भी प्रेम ही मुझको दिखा,
अनुज की अठखेलियों ने प्रेम का अक्षर लिखा !

युवावस्था में पिताजी ने सिखाया जो मुझे,
प्रेम आया उनकी सारी ज्ञानवर्धक बातों में !

साथियों संग प्रेम से आया मज़ा हर खेल में,
छोटे बड़े , अच्छे बुरे सब उन पलों के मेल में !

फिर मिला कोई वो जो सबसे अलग हमको लगा,
प्रेम जिसकी सांस से , प्रेम धड़कन से जगा !

अतः जग में प्रेम का कोई एक मानक है नहीं,
जिस जगह से स्नेह मिलता, प्रेम बस्ता है वहीँ !




No comments:

Post a Comment